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-: दोहा :-
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-- आसक्ति --
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दुःख जन्में आसक्ति से,करो न जग से प्रेम।
जगत पिता से प्रेम कर, वही करेंगे क्षेम।।
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दूर रहें आसक्ति से, यह है मानस रोग।
भूले से भी हम कभी, करें नहीं उपभोग।।
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त्याग करें आसक्ति का, शुभ होगा परिणाम।
अनासक्त जीवन रहे, संयम से लें काम।।
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गजेन्द्र हरिहारनो "दीप"डोंगरगाँव, जिला राजनांदगाँव,छत्तीसगढ़
सर्वथा मौलिक सृजन
सादर समीक्षार्थ प्रस्तुत
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